Mera Mulk - Mera Desh
मेरे मुल्क से बेहतर ना थी कोई जमीं
ना कोई आसमां इसके जैसा था
खुदा ने जन्नत कहा है जिसे
ये बिलकुल उसके जैसा था
यहां होती थी अब्दुल की दिवाली
रमेश भी ईद मनाता था
रहीम खाता था भंडारे का प्रसाद
सुरेश भी मजार पे सिर झुकाता था
अब न जाने कैसे ये नफरतों की आग में जलने लगा
इस्लाम खतरे में आ गया और हिंदुत्व भी
उसी राह चलने लगा
अब सियासत होने लगी जो धर्म के नाम पर
नुपुर की क्या हिम्मत थी
गर मुनव्वर ना करता अभद्र बाते सीता और राम पर
सियासी इस दौर में
उन धर्म के रहनुमाओं को
बस अपना धर्म बचाना है
फूंक दिए दुकान और मकान ना जाने कितने
इंसानियत को कहा किसी ने माना है
वक्त है अभी भी संभल जाओ तुम
जन्नत है इसे जन्नत रहने दो ,दौजक ना बनाओ तुम
जो तिरंगा हमारा अभिमान है
उसे धर्म के नाम पर यू चौक पर ना जलाओ तुम
बचा सकते हो तो इंसानियत बचा लो
धर्म खुद वा खुद बच जायेगा
फिर से फैसल की होगी दिवाली
फिर आशु भी ईद मनाएगा


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